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इतिहास नामा

आज़ाद भारत, भगत सिंह और बैरिस्टर आसिफ अली

उत्तर प्रदेश के शहर बरेली से युवा इतिहासकार जनाब अलतमश रज़ा खान की कलम से

( 🇮🇳 आज़ाद भारत, भगत सिंह और बैरिस्टर आसिफ अली 🇮🇳 )
आखिर सच क्यू छुपाया जाता है

जहां एक तरफ कुछ पाखंडी मुसलमानों को देशद्रोही बोलकर उनकी उकसा कर हिंदुत्व का ढोंग रच कर अपनी अपनी सियासत को चमकाने के लिए देश में नफरत का बीच बो रहे हैं, मुसलमानों को गद्दार और आज़ादी के वक्त उनके किरदार पर उंगली उठाते हैं।

 

वही दूसरी तरफ आज़ादी के समय जब बड़े बड़े तुर्रामखान ने अंग्रेज़ो के डर के मारे भगत सिंह का वकील बनने से मना कर दिया था और उनके तलवे चाटने लगे तो उम्मत ए मुस्लमां से एक चेहरा निकल कर आया था जिसका नाम था ( बैरिस्टर आसिफ अली ) जो सरदार भगत सिंह के वकील बने और निडर होकर उनका केस लड़ा था।

आसिफ अली के बारे में जानने से पहले हम आप को एक नाम और बताने जा रहे हैं जो ( राय बहादुर सूरज नारायण ) का है, जी हां ये वही नाम है जिसने भगत सिंह के खिलाफ जाके अंग्रेजों के तलवे चाट कर अपने देश से गद्दारी करके अंग्रेज़ो की तरफ से भगत सिंह के खिलाफ केस लड़ा था जो के एक हिन्दू था।

 

आप को बता दें बैरिस्टर आसिफ अली सरदार भगतसिंह के वकील थे, वह स्वतंत्रता संग्राम के नेताओ में से थे, उनका गांधी जी से बहुत करीबी ताल्लुक था उनके कहने पर दिल्ली असेम्बली का चुनाव भी लड़ा और जीत हासिल की

बैरिस्टर आसिफ अली ने सिर्फ भगत सिंह ही नही, बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों के मुकदमे लड़े जिन में सरदार भगतसिंह का मुकदमा भी था

लाल किला ट्रायल के नाम से मशहूर मुकदमा जिस में आज़ाद हिन्द फौज के मेजर जनरल शाहनवाज हुसैन , कर्नल गुरु बख्श सिंह ढिल्लन और कर्नल प्रेम सहगल पर मुकदमा चला था बचाव पक्ष की ओर से सर तेज बहादुर सप्रू के नेतृत्व वकीलों के एक दल तैयार हुआ जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू व बैरिस्टर आसिफ अली सदस्य थे

इसके अलावा कराची कोर्ट ट्रायल जो कांग्रेसी नेताओं के विरुद्ध मशहूर मुकदमा था उस में भी बैरिस्टर आसिफ अली बचाव पक्ष के वकील थे

1946 में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बनी सर्वदलीय सरकार में बैरिस्टर आसिफ अली रेलवे व ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर बनाए गए थे।

आज़ादी के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत के पहले राजदूत बनाए गए अमरीका के अलावा कई देशों में भारतीय राजदूत की हैसियत से काम किया जो के देश के लिए एक फख्र की बात थी

राजनीतिक इतिहासकार ए जी नूरानी की लिखी पुस्तक ‘The Trial of Bhagat Singh’ में दिए गए रेफरेंस से इसकी पुष्टि होती है।

किताब में दी गई जानकारी के मुताबिक, ‘एडिशनल मजिस्ट्रेट एफ बी पूल की अदालत में (केंद्रीय विधानसभा में बमबारी के मामले में) ट्रायल की शुरुआत 7 मई 1929 को हुई। ( बैरिस्टर आसिफ अली ) बचाव पक्ष के वकील के तौर पर पेश हुए, जबकि ( राय बहादुर सूरज नारायण ) अभियोजन पक्ष के वकील के तौर पर।

कोर्ट में भगत सिंह के अभिभावक, उनके चाचा अजित सिंह की पत्नी और अरुणा आसफ अली थे। जब उन्हें अदालत में लाया गया तब भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब ज़िंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद का नारा लगाना शुरू किया।

इंकलाब ज़िंदबाद का नारा ये वही नारा है जो ( मौलाना हसरत मोहानी साहब ) ने दिया था, जिस नारे ने बिगुल बजा कर रख दिया था।

 

🍂 मिट्टी में पानी मिलाओ तो गारा बनता है, खून मिलाओ तो वतन 🍂

🍂 अल्हमदोलिल्लाह हमने अपने मुल्क को अपने खून से सींच कर अपना वतन बनाया है 🍂

( हमारा इतिहास )
 अलतमश रज़ा खान
( उत्तर प्रदेश, बरेली मोहल्लाह शाहबाद )

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