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धुंध में भीगने का सपना अधूरा — 1.2 करोड़ की क्लाउड सीडिंग के बावजूद दिल्ली में नहीं हुई कृत्रिम बारिश

New India News / Desk
 राजधानी दिल्ली में जहरीली हवा और धुंध के बीच मंगलवार को 1.28 करोड़ रुपये की लागत से कृत्रिम वर्षा (क्लाउड सीडिंग) कराने का प्रयास किया गया, लेकिन आसमान से एक बूंद पानी नहीं गिरा। इस असफल प्रयोग ने दिल्ली सरकार पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आम आदमी पार्टी ने इस पर निशाना साधते हुए कहा कि जब विशेषज्ञ एजेंसियों ने पहले ही मना किया था कि दिल्ली में क्लाउड सीडिंग संभव नहीं है, तब रेखा गुप्ता सरकार ने जनता के पैसे का “कृत्रिम बारिश सर्कस” क्यों रचा? वहीं सरकार का कहना है कि यह प्रयोग असफल नहीं, बल्कि “प्रारंभिक परीक्षण” था और आगे और प्रयास किए जाएंगे।

जानकारी के मुताबिक, आईआईटी कानपुर की निगरानी में एक छोटे विमान ने उत्तर-पश्चिम दिल्ली और एनसीआर के कुछ इलाकों में सिल्वर आयोडाइड के फ्लेयर्स छोड़े, लेकिन पर्याप्त नमी न होने के कारण बारिश नहीं हो सकी। बताया गया कि इन दोनों परीक्षणों पर कुल 1.28 करोड़ रुपये खर्च हुए।

दरअसल, मई में दिल्ली कैबिनेट ने क्लाउड सीडिंग परियोजना को मंजूरी दी थी, जिसमें पाँच परीक्षणों के लिए कुल 3.21 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया — यानी हर प्रयोग पर लगभग 64 लाख रुपये की लागत। लेकिन लगातार तकनीकी और मौसम संबंधी कारणों से ये प्रयोग कई बार टलते रहे।

क्लाउड सीडिंग में विमान से सिल्वर आयोडाइड या अन्य रसायन बादलों में छोड़े जाते हैं ताकि वे भारी होकर बारिश बन सकें। इसे अब तक जल संकट वाले इलाकों में वर्षा बढ़ाने के लिए प्रयोग किया गया है, लेकिन यह पहली बार है जब प्रदूषण घटाने के लिए इसे आज़माया गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि कृत्रिम वर्षा से वायु में मौजूद प्रदूषक कण अस्थायी रूप से कम हो सकते हैं, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। वहीं वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि बार-बार सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायनों के इस्तेमाल से मिट्टी और जल स्रोतों में विषाक्तता फैल सकती है।

बता दें, दिवाली के बाद से दिल्ली की वायु गुणवत्ता ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी हुई है और सरकार ने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) का दूसरा चरण लागू कर रखा है।

इससे पहले बुराड़ी क्षेत्र में भी एक परीक्षण किया गया था, जो नमी की कमी के कारण असफल रहा था।

अब सवाल यह है कि क्या दिल्ली की हवा को साफ करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का यह तरीका सही दिशा में कदम है, या फिर यह भी सिर्फ एक “राजनीतिक दिखावा” बनकर रह जाएगा?

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