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बीफ़ पर देश में पाबंदी, विदेशों में अरबों का कारोबार, मोदी सरकार की ‘दोहरी नीति’ पर क्यों उठ रहे हैं तीखे सवाल?

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भारत में बीफ़ को लेकर राजनीति कोई नई नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इस बहस को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। एक तरफ़ देश के कई राज्यों में बीफ़ बेचने, खाने और गोवंश से जुड़े मामलों में सख़्त प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ नरेंद्र मोदी सरकार विदेशी मुस्लिम देशों को हलाल-प्रमाणित बीफ़ और मांस निर्यात को खुलकर बढ़ावा दे रही है। यही विरोधाभास अब सरकार की नीयत और नीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

बीफ़ नहीं, भैंस का मांस — फिर राजनीति क्यों?

सरकारी दस्तावेज़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत से निर्यात होने वाला तथाकथित ‘बीफ़’ गाय का नहीं बल्कि भैंस (काराबीफ़) का मांस है। इसके बावजूद देश के भीतर इसे धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दा बनाकर पेश किया जाता है।

आंकड़े बताते हैं कि—

  • 2023–24 में भारत ने 13 लाख मीट्रिक टन से अधिक भैंस मांस निर्यात किया

  • इसका मूल्य 3.7 से 4 अरब अमेरिकी डॉलर के करीब रहा

  • 2024–25 में यह कारोबार 4 अरब डॉलर से भी आगे बढ़ गया

इसके बावजूद भारत में बीफ़ की खपत 4 प्रतिशत से भी कम है। सवाल यह है कि जब देश में बीफ़ खाने वाले गिनती के लोग हैं, तो फिर इसके नाम पर नफ़रत और राजनीति क्यों?

गोहत्या प्रतिबंध के बावजूद घटती गोवंश आबादी

मोदी सरकार और उससे जुड़े संगठनों का दावा है कि गोवंश संरक्षण उनकी प्राथमिकता है। लेकिन सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है।

  • 1951 में भारत में गोवंश की हिस्सेदारी 53% थी

  • 2012 में यह घटकर 37% रह गई

यानी प्रतिबंध बढ़े, नारे तेज़ हुए, लेकिन गायों की संख्या लगातार घटी। इसके उलट भैंसों की आबादी बढ़ती गई, क्योंकि वही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अरबों का मुनाफ़ा दिला रही हैं।

मांस निर्यात से जुड़े विशेषज्ञ साफ़ कहते हैं कि प्रतिबंधों की वजह से किसान दूध न देने वाली गायों को बेच नहीं पाते, उन्हें पालना बोझ बन जाता है। खेती के मशीनीकरण के बाद बैल और बछड़े भी बेकार हो चुके हैं। नतीजा—गोवंश संरक्षण कागज़ों में, ज़मीनी हकीकत में नहीं।

बीफ़ कारोबार: न धर्म, न मज़हब

बीफ़ उद्योग को अक्सर एक खास समुदाय से जोड़कर बदनाम किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि करीब 28 हज़ार करोड़ रुपये के इस कारोबार में गैर-मुस्लिम व्यापारियों की भागीदारी कहीं ज़्यादा है

अल-कबीर एक्सपोर्ट्स, अल-नूर एक्सपोर्ट, अरेबियन एक्सपोर्ट जैसी बड़ी कंपनियों के मालिकों के नाम ही यह साफ़ कर देते हैं कि यह धंधा किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों और वैश्विक बाज़ार की देन है

हलाल मांस: देश में विवाद, विदेश में सुविधा

बीते वर्षों में भारत में हलाल मांस को लेकर टीवी डिबेट, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और राजनीतिक बयानबाज़ी आम रही है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 16 अक्टूबर 2024 से मोदी सरकार ने 15 मुस्लिम देशों को हलाल मांस निर्यात की अनुमति दे दी

इन देशों में—
सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन, ईरान, इराक, तुर्की, मलेशिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश जैसे नाम शामिल हैं।

सरकार ने इसके लिए I-CAS Halal Certification को अनिवार्य कर दिया है और पूरी प्रक्रिया को संस्थागत समर्थन दिया है। यानी देश के भीतर हलाल को ‘विवाद’ और विदेश में ‘व्यापारिक अवसर’ बना दिया गया।

सवाल सिर्फ़ बीफ़ का नहीं, नीति और नीयत का है

आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार की यह नीति साफ़ तौर पर राजनीति और अर्थव्यवस्था को अलग-अलग चश्मे से देखने की कोशिश है।

देश में वोट बैंक के लिए बीफ़ और हलाल को मुद्दा बनाया जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में वही चीज़ें अरबों डॉलर का व्यापार बन जाती हैं। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है—

क्या बीफ़ पर प्रतिबंध आस्था की रक्षा के लिए है, या सियासत की सुविधा के लिए?
और क्या विदेशों में हलाल व्यापार को बढ़ावा देना उसी आस्था से समझौता नहीं है?

एक ओर गाय के नाम पर सख़्ती, दूसरी ओर भैंस के मांस से अरबों की कमाई—
मोदी सरकार की यह दोहरी नीति अब सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुकी है।

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