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क्या वाकई मुग़ल भारत में पटाखे लेकर आए थे? - New India News
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क्या वाकई मुग़ल भारत में पटाखे लेकर आए थे?

Newindianews/Delhi  एक रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में दिवाली से पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री रोक दी. याचिका दायर कर इस फ़ैसले पर दोबारा विचार करने का आग्रह किया गया तो भी अदालत ने अपना फ़ैसला नहीं बदला.इस घटनाक्रम के बाद बीबीसी हिन्दी ने अपने पाठकों से पूछा कि इस फ़ैसले की पृष्ठभूमि में आप किस पहलू की कवरेज चाहते हैं.

हमें कई सवाल मिले.कुछ ने पूछा कि दिल्ली के प्रदूषण में पटाखों की हिस्सेदारी क्या रहती है. दूसरों ने जानना चाहा कि इस बैन से पटाखा कारोबार में लगे लोगों को कितना नुकसान होगा.

लेकिन ज़्यादातर सवाल हमें ऐसे मिले जिनका ताल्लुक़ पटाखों और आतिशबाज़ी के इतिहास से था.

लोकेश पाल ने पूछा- ”दीपावली पर आतिशबाजी करना कब और कैसे शुरू हुआ और क्यों? क्या दीपावली पर आतिशबाजी करना पौराणिक काल से ही जुड़ा हुआ है?”

विजय खंडेरा का सवाल है, ”दीपावली में पटाखों का प्रचलन कबसे प्रारंभ हुआ? क्या आतिशबाज़ी का ज़िक्र धर्म ग्रंथों में मिलता है?”

और हमने सबसे पहले इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की. क्या भारत में आतिशबाज़ी को लेकर क्य सच में ऐसी कोई इतिहास सम्मत परम्परा रही है?

प्राचीन ग्रंथों में विवरण?

पंजाब विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाने वाले राजीव लोचन का जवाब कुछ इस तरह से है:

मिथकों और प्राचीन ग्रंथों के विवरण से तो ऐसा नहीं लगता.

प्राचीन ग्रंथों में दिवाली के त्योहार पर भी लोग ख़ुशी का इज़हार रौशनी कर के करते थे, शोर कर के नहीं.

पटाखों से शोर करना तो चीन की परम्परा थी. चीन में मान्यता थी की पटाखों के शोर से डर कर बुरी आत्माएं, विचार, दुर्भाग्य भागेगा और सौभाग्य प्रबल होगा.

यह विचार शायद भारत में आतिश दीपांकर नाम के बंगाली बौद्ध धर्मगुरू ने 12वीं सदी में प्रचलित किया.

वे शायद इसे चीन, तिब्बत और पूर्व एशिया से सीख कर आए. अन्यथा भारत के ऋग्वेद में तो दुर्भाग्य लाने वाली निरृति को देवी माना गया है और दिकपाल (दिशाओं के 9 स्वामियों में से एक) का दर्जा दिया गया है.

पटाखों का ज़िक्र

उससे प्रार्थना की जाती है कि हे देवी, अब जाओ. पलट कर मत आना. यह कहीं नहीं कहा गया कि उसे पटाख़ों की आवाज़ से डरा धमका कर भगाया जाए. इतना ज़रूर है कि भारत प्राचीन काल से ही विशेष रोशनी और आवाज़ के साथ फटने वाले यंत्रों से परिचित था. दो हज़ार से भी ज़्यादा साल पहले भारत के मिथकों में इस तरह के यंत्रों का वर्णन है.

ईसा पूर्व काल में रचे गए कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी एक ऐसे चूर्ण का विवरण है जो तेज़ी से जलता था, तेज़ लपटें पैदा करता था और यदि इसे एक नालिका में ठूंस दिया जाए तो पटाख़ा बन जाता था. बंगाल के इलाक़े में बारिश के मौसम में बाद कई इलाक़ों में सूखती हुई ज़मीन पर ही लवण की एक परत बन जाती थी

लवण से पटाखे?

इस लवण को बारीक पीस लेने पर तेज़ी से जलने वाला चूर्ण बन जाता था. यदि इसमें गंधक और कोयले के बुरादे की उचित मात्रा मिला दी जाए तो इसकी ज्वलनशीलता भी बढ़ जाती थी. जहां ज़मीन पर यह लवण नहीं मिलता था वहां इसे उचित क़िस्म की लकड़ी की राख की धोवन से बनाया जाता था. वैद्य भी इस लवण का इस्तेमाल अनेक बीमारियों के लिए करते थे.

लगभग सारे देश में ही यह चूर्ण और इससे बनने वाला बारूद मिल जाता था. पर लगता नहीं कि इसका इस्तेमाल पटाख़े बनाने में होता था. ख़ुशियां मनाने के लिए, उल्लास जताने के लिए घर द्वार पर रौशनी ज़रूर की जाती थी. पर इस रौशनी में भी पटाखों का तो कोई विवरण नहीं मिलता. घी के दिए जलने का उल्लेख ज़रूर है.

यह बारूद इतना ज्वलनशील भी नहीं था कि इसका इस्तेमाल दुश्मन को मारने के लिए किया जा सके. उस तरह के बारूद का ज़िक्र तो शायद पहली बार 1270 में सीरिया के रसायनशास्त्री हसन अल रम्माह ने अपनी किताब में किया जहां उन्होंने बारूद को गरम पानी से शुद्ध कर के ज़्यादा विस्फोटक बनाने की बात कही.

पटाखे
क्या मुग़ल लाए?

पर इसके बाद भी, जब 1526 में काबुल के सुल्तान बाबर ने मुग़ल सेना के साथ मिल कर दिल्ली के सुल्तान पर हमला किया तो इतिहासकार कहते हैं कि उसकी बारूदी तोपें की आवाज़ सुन कर भारतीय सैनिकों के छक्के छूट गए. यदि मंदिरों और शहरों में पटाख़़े फोड़ने की परम्परा रही होती तो शायद ये वीर सिपाही तेज़ आवाज़ से इतना न डरते.

दूसरे जानकार क्या कहते हैं? कुछ लोगों का कहना है कि पटाखे और आतिशबाज़ी मुग़लों के बाद शुरू हुई. लेकिन जानकार इसे भी अधूरी जानकारी बताते हैं.

पटाखे

इमेज स्रोत,GETTY IMAGES

‘पटाखे पहले से थे’

मुग़लकालीन इतिहास के प्रोफ़ेसर नजफ़ हैदर की राय-

मुग़लों के दौर में आतिशबाज़ी और पटाखे ख़ूब इस्तेमाल होते थे, ये तो पता है. लेकिन ये कहना सही नहीं होगा कि भारत में पटाखे मुग़ल ही लेकर आए थे. ये दरअसल, उनसे पहले ही आ चुके थे.

पेंटिंग भी हैं. दारा शिकोह की शादी की पेंटिंग में लोग पटाखे चलाते हुए देखे जा सकते हैं. लेकिन ये मुग़लों से पहले भी थे. फ़िरोज़शाह के ज़माने में भी आतिशबाज़ी ख़ूब हुआ करती थी.’

गन पाउडर बाद में भारत में आया. लेकिन मुग़लों से पहले पटाखे ज़रूर आ गए थे. इसका बड़ा इस्तेमाल शिकार या हाथियों की लड़ाई के दौरान होता था. पटाखे चलाए जाते थे ताकि उन्हें डराया जा सके.

मुग़ल दौर में शादी या दूसरे जश्न में भी पटाखे और आतिशबाज़ी होती थी.

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